अच्छे दिनों का वार

अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया
सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया, 

            दिया था जिसको आशियाना बनाने का हक़
           उसी ने सब कुछ तबाह कर दिया, 

रेत की तरह फिसल गया हाथ से सब कुछ
अब अपनी गलती का एहसास हो गया, 
         
            जिसको बिठाया था अपने सर आखों पर
            उसी ने पीठ पीछे वार कर दिया, 

अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया
सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया, 

            कहता था जो खुद को प्रधान सेवक
            आज बस प्रधान बन कर रह गया, 

लोकतंत्र देश में निरकुंश शासन का राज हो गया

            अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया
            सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया, 

महंगाई छू रही हैं आसमान
जनता हो रही हैं परेशान
पर प्रधान सेवक हैं न जाने कौन सी विमान पर सवार, 

            पारा चढ़ता हैं पैट्रोल- डिजल का बार बार
            रसोई गैस लेना भी हुआ अब दुशवार
            काम धंधों का हुआ है बंटा धार

फिर भी कहती हैं मोदी सरकार
अच्छे दिन लाएंगे फिर इस बार, 
      
            अच्छे दिन लाएंगे फिर इस बार

तो अब बोलो आप
क्या फिर से चाहिए आपको ये अच्छी मोदी सरकार?? 

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