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बारिश

बरस गए हैं बादल, फिर भी वर्षा होनी है, आसमान में जो बूंदें रह गई, उनकी झमाझम होनी है। भागों घर जल्दी अपने, नहीं तो बारिश तुमको रोकेंगी, गलती से जो भींग गए तुम, तो मम्मी तुमको कूटेंगी। अगर जो पड़ गए बीमार तुम, हो जाओगे लाचार तुम, न कोई चीज अच्छी लगेगी, बस नाक सुड़-सुड़ करके बहेगी। इसलिए मेरी मानो तुम, फिर बारिश आने से पहले, हो जाओ फ़रार तुम। घर पहुंचों और खाओ पकोड़े, मनाओ मौसम का त्योहार तुम। अब छोड़ो ऑफिस का काम, घर जाकर करो आराम, करो कल की क्लास की तैयारी, और बनाओं अपना नाम।

मैं इक लाश हुं

मैं इक लाश हुं इस रोड़ पर पड़ा इक अनजान लाश!  घबराइये मत, मैं नहीं मरा इस कोरोना महामारी से,  न ही मरा मैं भूख की लाचारी से!  मैं तो मरा हुं साहब, इस देश को सम्भालने वाले झूठे ठेकेदारो से!  अरे साहब, खामोश रहिये, नाम न लिजीए या मेरी मानिये, तो आप भी बिछा लिजीए बिस्तर मेरे साथ ही नहीं तो मर जाएगें खाक ही मेरा क्या, मैं इक लाश हुं!  पहले मेरी आवाज इनको सुनाई नहीं देते थे मेरे आंसू दिखाई नहीं देते थे पर अब मैं आजाद हुं क्योंकि, मैं इक लाश हुं!  अब मैं यूँ रोड़ पर पड़ा- पड़ा  बोल सब रहा हूँ,  बस आवाज की शक्ल  मेरे शरीर पर पड़े, मेरे घावों ने ले लिए,  जो कई किलोमीटर दूर चल मेरे साथी बन लिए!  साहब, मैं जहाँ जहाँ गया बस इस देश के ठेकेदारो ने मुझे कभी गालियाँ, कभी डंडा तो कभी झूठे आसवासन दिए बस एक यहीं घाव है, जो हर पल मेरे साथ रहें!  मैं एक कदम चलता, तो ये दो कदम,  और टूट गई जब चप्पल मेरी, और चुभा कोई कांटा,  तो मुझसे पहले बहाया खून भी तो मेरे घाव ने ही तो कैसे न कहुँ मैं इन्हें अपना दोस्त, जिन्होंने निभाया मेरा साथ मौत के ह...

अच्छे दिनों का वार

अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया,              दिया था जिसको आशियाना बनाने का हक़            उसी ने सब कुछ तबाह कर दिया,  रेत की तरह फिसल गया हाथ से सब कुछ अब अपनी गलती का एहसास हो गया,                        जिसको बिठाया था अपने सर आखों पर             उसी ने पीठ पीछे वार कर दिया,  अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया,              कहता था जो खुद को प्रधान सेवक             आज बस प्रधान बन कर रह गया,  लोकतंत्र देश में निरकुंश शासन का राज हो गया             अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया             सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया,  महंगाई छू रही हैं आसमान जनता हो रही हैं परेशान पर प्रधान सेवक हैं न जाने कौन सी विमान पर स...

अस्मिता की पहचान

अस्मिताओं के इस कटघरे में आज खुद को भी खड़ा पाया हैं,                  पुछा हैं सवाल आज खुद से यह                 अब तक के जीवन में मैंने क्या कमाया हैं,  कमाई तो हैं पूंजी बहुत और ईंट कंकड़ का घर बनाया हैं,                  फिर भी न जाने क्यों                 सुकून मुझसे कोसों दूर समाया हैं,  प्रश्न हैं अब भी मन में यहीं,  क्या मैंने अपनी अस्मिता को उसका सही हक़ दिलाया हैं? क्या मैंने अपनी अस्मिता को उसका सही हक़ दिलाया हैं??? 

मैं क्या चाहती हूँ?

मैं क्या चाहती हूँ? या क्या नहीं चाहती?  यह सवाल हमेशा से मेरे मन में उथल पुथल मचाते ही रहते हैं लेकिन तब भी यह समझ नहीं आता कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ?  वास्तव में तो मैं सबकी पसंद का ध्यान रखते रखते स्वयं ही भूल गई हूँ कि मैं क्या चाहती हूँ?  प्रश्न बहुत छोटा हैं लेकिन मेरे मन की घुटन को व्यक्त करता हैं! अब यह मन व्याकुल है उन तमाम जंजीरों को तोड़ने के लिए जो मुझे पसंद नहीं!  अब 'मैं', 'मैं' बनकर जीना चाहती हूँ!  माना हक़ हैं उन सबका, जो किसी न किसी रिश्ते से जुड़ा हैं मुझसे, लेकिन अब मैं खुद का खुद पर हक़ पहचानना चाहती हूँ, मैं अब वो सबको बताना चाहती हूँ!  मैं बस अब अपने मन का करना चाहती हूँ! नहीं चाहती उन तमाम बंदिशों को, जो मेरे मन को बांधें बैठे हैं! अब उन बंदिशों को तोड़ मैं भी खुले आसमान में उड़ना चाहती हूँ,  हां अब मैं यहीं करना चाहती हूँ!  दुसरो के साथ साथ स्वयं की भी खुशी चाहती हूँ!  'मैं', 'मैं' हूँ और 'मैं' बनकर ही जीना चाहती हूँ!  माना गलत नहीं हैं औरों की खुशियों का ध्यान रखना लेकिन अब मैं भी मतलबी होना चाहती हूँ! दूसरों क...

कोरोना में "रोना "

आज 11 अप्रैल 2020 पूरा विश्व एक वैश्विक महामारी को झेल रहा हैं, जिसका नाम है "कोरोना" या Covid19. ऐसा माना जाता हैं कि इस महामारी  की उत्पत्ति चीन देश से हुई! बहरहाल उतपत्ति कहीं से भी हुई हो लेकिन इस महामारी की वजह से कुछ ही दीनों में मौत का आंकड़ा कई हज़ार ऊपर जा चुका है और सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि इस महामारी का उपचार अभी तक किसी देश को नहीं मिला है! इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए संपूर्ण देश "लाॅकडाऊन" की पद्धति को अपना रहा है, जिसकी वजह से प्रत्येक व्यक्ति को घर से बाहर न निकलने के लिए कहा गया है! ताकि यह महामारी और अधिक लोगों को संक्रमित न करें!  इसी महामारी के दौर में "देवेंद्र शर्मा " अपने छोटे से परिवार के साथ भारत देश के नई दिल्ली शहर के द्वारका मोड़ के निवासी हैं! कई सालों पहले वह अपनी पत्नी चम्पा के साथ बिहार से दिल्ली आ कर बस गए थे! यहीं इनके तीनों बच्चों का जन्म तथा पालन- पोषण हुआ! पेशे से बढ़ई के उत्तम कारीगर हैं!  जिंदगी में कई उतार चढ़ाव के बावजूद भी देवेंद्र अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ खुशी खुशी अपना जीवन यापन कर रहा था! बीच ...

रिहाई

नहीं चाह अब मुझे किसी चीज की अब तो जिंदगी से रिहाई चाहिए! बहुत रह ली बेड़ियों में अब जिन्दगी से न रुसवाई चाहिए! थक चुकी हुं संकीर्ण मानसिकता से लड़ते लड़ते, अब जिन्दगी में कुछ नई ऊचांई चाहिए! खुद कहोगे तुम एक दिन मुझे सही मुझे उस दिन की एक खास परछाई चाहिए! नहीं चाह अब मुझे कीसी चीज की अब तो जिंदगी से रिहाई चाहिए! बहुत रह ली बेड़ियों में अब जिंदगी से न रुसवाई चाहिए!        ----तानिया शर्मा----