कोरोना में "रोना "
आज 11 अप्रैल 2020 पूरा विश्व एक वैश्विक महामारी को झेल रहा हैं, जिसका नाम है "कोरोना" या Covid19. ऐसा माना जाता हैं कि इस महामारी की उत्पत्ति चीन देश से हुई! बहरहाल उतपत्ति कहीं से भी हुई हो लेकिन इस महामारी की वजह से कुछ ही दीनों में मौत का आंकड़ा कई हज़ार ऊपर जा चुका है और सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि इस महामारी का उपचार अभी तक किसी देश को नहीं मिला है! इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए संपूर्ण देश "लाॅकडाऊन" की पद्धति को अपना रहा है, जिसकी वजह से प्रत्येक व्यक्ति को घर से बाहर न निकलने के लिए कहा गया है! ताकि यह महामारी और अधिक लोगों को संक्रमित न करें!
इसी महामारी के दौर में "देवेंद्र शर्मा " अपने छोटे से परिवार के साथ भारत देश के नई दिल्ली शहर के द्वारका मोड़ के निवासी हैं! कई सालों पहले वह अपनी पत्नी चम्पा के साथ बिहार से दिल्ली आ कर बस गए थे! यहीं इनके तीनों बच्चों का जन्म तथा पालन- पोषण हुआ! पेशे से बढ़ई के उत्तम कारीगर हैं!
जिंदगी में कई उतार चढ़ाव के बावजूद भी देवेंद्र अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ खुशी खुशी अपना जीवन यापन कर रहा था! बीच बीच में जब भी उसे समय मिलता वह अपने पूरे परिवार के साथ अपने गाँव बिहार के सिवान जिला में स्थित छोटे से गाँव बाजितपुर जाता आता रहता था!
मध्यम वर्ग से सम्बन्धित होने के बावजूद दोनों पति- पत्नी का एक ही सपना था अपने बच्चों को शिक्षित करना! इसी सोच की बदौलत बड़ा बेटा आज एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंट संभालता है और दुसरे नम्बर की बेटी दो विषयों में मास्टर्स करके पी. एच. डी. में प्रवेश लेने के लिए निरंतर प्रयास कर रहीं हैं! सबसे छोटी बेटी की तो 2018 में महज 16 वर्ष की आयु में ही आकास्मिक मृत्यु हो चुकी हैं!
अल्पायु में बेटी की मृत्यु के दंज को झेलने के बाद पूरा परिवार फिर से एक बार जिंदगी की पटरी पर लौट आया और बड़े बेटे की शादी 2019 में कर दीदी गई! समय जैसे बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से आगे बढ़ा और घर में एक छोटे से सदस्य के आने के दिन गिने जाने लगे! देवेंद्र भी मानों खुशी के फूला नहीं समा रहा था जब उसे पहली बार यह खबर मिली की वह दादा बनने वाला है!
ऐसे ही आने वाले बच्चे के इंतज़ार में दिन बीतता गया और बहुत जल्दी साल 2020 आ गया! नए साल में नई उम्मीदें और नए अरमान लेकर देवेंद्र अपने परिवार के साथ सुखमय जीवन बीता रहा था! लेकिन वक़्त की तो मर्ज़ी ही कुछ और थी! वक़्त ने आज न केवल देवेंद्र और उसके परिवार को बल्कि समूचे विश्व को एक ऐसे अदृश्य दुश्मन के सामने खड़ा कर दिया जिसका सामना करने में पूरा देश भरसक प्रयास में लगा हुआ है परंतु सफलता अभी तक हाथ नहीं लगीं!
ऐसी परिसिथति में जब भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पूरा देश लाॅकडाऊन किया तो देवेंद्र भी एक अच्छे नागरिक का परिचय देते हुए अपने परिवार के साथ घर में ही सुरक्षित रहते हुए कोरोना महामारी को हराने का फैसला किया! लेकिन इस परिस्थिति में देवेंद्र व उसके परिवार की चिंता का विषय है उसकी बहु के गर्भ में 7 महीनों से पल रहा शिशु! संपूर्ण भारत लाॅकडाऊन होने की वजह से होने वाली माँ की जो चिकीत्सीय जांच होनी चाहिए वो भी नहीं हो पा रहीं!
देवेंद्र अभी इस समस्या से जूझ ही रहा था कि आज अर्थात 11 अप्रैल की प्रातःकाल में तकरीबन 4 बजे देवेंद्र के मोबाइल फोन की घंटी बजती है! यह फोन उसके गाँव से था! मोबाइल फोन पर समाचार सुनते ही वह मानों कुछ पल के लिए स्तब्ध सा रह गया हो, जैसे उसके पैरों तले से किसी ने जमीन ही खींच ली हो! गाँव में उसकी माँ जिंदगी के अंतिम पल में आज उसकी प्रतीक्षा में बिस्तर पर लेटी अपने बेटे को अंतिम बार देखने के लिए अपनी बचीं सांसों को गिन गिन कर खर्च कर रहीं हैं! यह समाचार सुनते ही देवेंद्र जल बिन मछली की तरह इधर से उधर अपनी माँ के पास जाने के लिए परमिशन मांगने निकल पड़ा! वह कभी पूलिस अधिकारियों के पास जाता तो कभी एस डी एम के पास! कभी किसी के सामने रोता, तो कभी किसी के सामने गिड़गिड़ाता! परंतु कहीं से भी उसको सफलता हाथ नहीं लगी! अंततः वह थक हार कर बेबस, लाचार की तरह घर लौट आता है!
आज इस महामारी से तो वह बच गया लेकिन अंदर ही अंदर अपनी माँ को अंतिम बार न देख पाने की ग्लानि से वह प्रतिपल मर रहा है!
कितनी पीड़ादायक है यह स्थिति जहाँ एक बुढ़ी आंखें अपने बेटे के इंतज़ार में उस राह पर टिकी हुई है, जिस पर वह अपने बेटे को आते हुए अब कभी नहीं देख पाएगी!
-----तानिया शर्मा-----
प्रत्येक सामान्य जन लगभग इन्हीं संकटों से गुज़र रहा है।
ReplyDeleteआज मानव चहारदीवारी में क़ैद हो कर रह गया..
जुर्म किसका, कैसा और कितना गहरा है..?
यह बड़ा सवाल बन चुका हैं..!
सटीक चित्रण खींचने में लेखक पूर्णता सफल हैं..