मैं क्या चाहती हूँ?
मैं क्या चाहती हूँ? या क्या नहीं चाहती? यह सवाल हमेशा से मेरे मन में उथल पुथल मचाते ही रहते हैं लेकिन तब भी यह समझ नहीं आता कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ? वास्तव में तो मैं सबकी पसंद का ध्यान रखते रखते स्वयं ही भूल गई हूँ कि मैं क्या चाहती हूँ? प्रश्न बहुत छोटा हैं लेकिन मेरे मन की घुटन को व्यक्त करता हैं! अब यह मन व्याकुल है उन तमाम जंजीरों को तोड़ने के लिए जो मुझे पसंद नहीं! अब 'मैं', 'मैं' बनकर जीना चाहती हूँ! माना हक़ हैं उन सबका, जो किसी न किसी रिश्ते से जुड़ा हैं मुझसे, लेकिन अब मैं खुद का खुद पर हक़ पहचानना चाहती हूँ, मैं अब वो सबको बताना चाहती हूँ! मैं बस अब अपने मन का करना चाहती हूँ! नहीं चाहती उन तमाम बंदिशों को, जो मेरे मन को बांधें बैठे हैं! अब उन बंदिशों को तोड़ मैं भी खुले आसमान में उड़ना चाहती हूँ, हां अब मैं यहीं करना चाहती हूँ! दुसरो के साथ साथ स्वयं की भी खुशी चाहती हूँ! 'मैं', 'मैं' हूँ और 'मैं' बनकर ही जीना चाहती हूँ! माना गलत नहीं हैं औरों की खुशियों का ध्यान रखना लेकिन अब मैं भी मतलबी होना चाहती हूँ! दूसरों क...