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Showing posts from April, 2026

बारिश

बरस गए हैं बादल, फिर भी वर्षा होनी है, आसमान में जो बूंदें रह गई, उनकी झमाझम होनी है। भागों घर जल्दी अपने, नहीं तो बारिश तुमको रोकेंगी, गलती से जो भींग गए तुम, तो मम्मी तुमको कूटेंगी। अगर जो पड़ गए बीमार तुम, हो जाओगे लाचार तुम, न कोई चीज अच्छी लगेगी, बस नाक सुड़-सुड़ करके बहेगी। इसलिए मेरी मानो तुम, फिर बारिश आने से पहले, हो जाओ फ़रार तुम। घर पहुंचों और खाओ पकोड़े, मनाओ मौसम का त्योहार तुम। अब छोड़ो ऑफिस का काम, घर जाकर करो आराम, करो कल की क्लास की तैयारी, और बनाओं अपना नाम।

मैं इक लाश हुं

मैं इक लाश हुं इस रोड़ पर पड़ा इक अनजान लाश!  घबराइये मत, मैं नहीं मरा इस कोरोना महामारी से,  न ही मरा मैं भूख की लाचारी से!  मैं तो मरा हुं साहब, इस देश को सम्भालने वाले झूठे ठेकेदारो से!  अरे साहब, खामोश रहिये, नाम न लिजीए या मेरी मानिये, तो आप भी बिछा लिजीए बिस्तर मेरे साथ ही नहीं तो मर जाएगें खाक ही मेरा क्या, मैं इक लाश हुं!  पहले मेरी आवाज इनको सुनाई नहीं देते थे मेरे आंसू दिखाई नहीं देते थे पर अब मैं आजाद हुं क्योंकि, मैं इक लाश हुं!  अब मैं यूँ रोड़ पर पड़ा- पड़ा  बोल सब रहा हूँ,  बस आवाज की शक्ल  मेरे शरीर पर पड़े, मेरे घावों ने ले लिए,  जो कई किलोमीटर दूर चल मेरे साथी बन लिए!  साहब, मैं जहाँ जहाँ गया बस इस देश के ठेकेदारो ने मुझे कभी गालियाँ, कभी डंडा तो कभी झूठे आसवासन दिए बस एक यहीं घाव है, जो हर पल मेरे साथ रहें!  मैं एक कदम चलता, तो ये दो कदम,  और टूट गई जब चप्पल मेरी, और चुभा कोई कांटा,  तो मुझसे पहले बहाया खून भी तो मेरे घाव ने ही तो कैसे न कहुँ मैं इन्हें अपना दोस्त, जिन्होंने निभाया मेरा साथ मौत के ह...

अच्छे दिनों का वार

अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया,              दिया था जिसको आशियाना बनाने का हक़            उसी ने सब कुछ तबाह कर दिया,  रेत की तरह फिसल गया हाथ से सब कुछ अब अपनी गलती का एहसास हो गया,                        जिसको बिठाया था अपने सर आखों पर             उसी ने पीठ पीछे वार कर दिया,  अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया,              कहता था जो खुद को प्रधान सेवक             आज बस प्रधान बन कर रह गया,  लोकतंत्र देश में निरकुंश शासन का राज हो गया             अच्छे दिनों की चाहत में यह क्या हो गया             सब कुछ राख की तरह धुआँ हो गया,  महंगाई छू रही हैं आसमान जनता हो रही हैं परेशान पर प्रधान सेवक हैं न जाने कौन सी विमान पर स...